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Saturday, June 06, 2020

नारी तुम केवल श्रध्दा हो.......

नारी तुम केवल श्रध्दा हो.......

संकल्प अश्रु जल से
तुम दान पहले 
ही कर चुकी
सर पर पल्ला लिए
लज्जा के घूंघट में
घुटन अपनी छुपाती
सुख मुक्ता युक्त हूँ
दुख तिरस्कृत वयक्ता हूँ
यातनाएं वेदनाएं पीड़ा
कितनी ना कोई छोर 
नयनो में अर्ध्य लिए
निराश्रित ही चलती 
स्वीकार है मुझे
मैं अंग मैं देह हूँ
इससे परे और भी
कुछ  हूँ  मैं
देह के अंदर भी 
झांकने का 
प्रयास तो करो
अंग के सिवा भी
 कुछ मागंने का
 प्रयास तो करो
मैं अहिल्या मैं सीता
मैं वीणा भी बनी
मैं निर्भया भी बनी
राम के यज्ञ की आहुति
सत्य की दीपिका बन
राजधानियों में भी लुटी
मृत्यु से पहले ही
ना जाने कितनी बार मरी
नए युग में नयी चेतना के 
अनगिनत सम्भावनाए लिए
मौन फिर भी खड़ी हूँ 
    क्योंकि
नारी तुम केवल श्रध्दा हो।।

डाॅ प्रियदर्शिनी अग्निहोत्री

समझा कोई अपना होगा

तुमको जब जब मैंने देखा 
समझा कोई अपना होगा 
जीवन के निस्सीम पथ पर 
गुरू जीवन का भार पड़ा है 
मैं ममता की मौन पुजारिन 
जली आरती लिए खडी हूँ 
ढूंढ निकालुँगी तुमको मैं 
धरती के इस महा विजन से 
मन के पत्थर पाषाणो को 
चाहें जितना कपँना होगा
किन्तु अधरो के कम्पन बनते 
वाणी की नन्हीं सी सीमा 
मैं समझी  बनता कोई 
पथ का नूतन बन्धन होगा 
पथ की इस सुनसान दिशा में 
मुझको भरम तब हो जाता है 

तुमको जब जब मैंने देखा 
समझा कोई अपना होगा।।

डॉ प्रियदर्शिनी अग्निहोत्री

Wednesday, June 03, 2020

वन्देमातरम। महामंत्र बने



आदेश थमा दो सेना को सरहदो को मिटाने का 
फिर दुनिया   देखेगी अंजाम हमे उकसाने का 
सत्य, अहिंसा, प्रेम 
कायर के हथियार 
काल बना वीर का 
जीवन   श्रृंगार 
जो अस्त्र परदुख के 
अश्रु  लेकर  मचलता 
उसमें अजेय बल होता 
न्याय युद्ध जो शस्त्र करें 
उसे भावनाओं का बल मिले 
जिस आयुध में शक्ति विजय की 
उसमें जनहित बल होता 
किन्तु रक्षा मुक्ति हेतु 
गांडीव टंकार जरूरी होती 
तभी जय पर जय होती 
राजप्रसाद का सुख भोगे खादी 
जनता भोगे दुख  त्रासदी 
बिकता है ईमान देश में 
सुख के अभिशापो सेे
सहने की सीमा आ पहुँची 
मर्यादाएं न अपनी बाँधो 
अधिकारों की भीख न माँगो 
जहाँ न्याय पर चलती तलवारें 
उन तंत्रों का गर्व मिटा डालो 
हिंसक लोगों को हिंसा का ही 
पहला सबक सिखला दो 
मिट जाए जाति पाँति का बंधन 
मिट जाए राज्यों का सीमा बंधन 
इतिहास बदल दो सीमाओं का 
एक तिरंगा फहरा दो
जिससे खिलते कमल देश के 
वो वीर भला कब चुप होता है 
पांचजन्य उदधोष करें 
वन्देमातरम। महामंत्र बने 
महामंत्र बने महामंत्र बने।। 

डॉ प्रियदर्शिनी अग्निहोत्री