Showing posts with label आखिरी आस. Show all posts
Showing posts with label आखिरी आस. Show all posts

Thursday, June 11, 2020

बूढ़ी हो गई आस की राहें

बूढ़ी हो गई आस की राहें 
साँस की आहट तेरी तकते तकते 
एक अजीब सी खामोशी में 
मैंने सुनी हजारों हजार खामोश 
साँसों की आवाज़ अभी अभी 
मोती साँसों के बिखर रहे पल पल 
सीमाओं में बन्ध रहा जीवन 
न हो कर भी उनके होने का अहसास 
अतीत के गलियारों में 
भटकता मेरा मन 
कितना क्या कुछ पीछे छूटा 
अपना क्या कुछ खोया 
मेरा घर मेरा बचपन 
वो छोड़ गये केवल 
अनगिनत यादों के मौसम 
फिर भी मृत्यु शैय्या पर 
सहज वो हैं सहज वो हैं।। 

डॉ प्रियदर्शिनी अग्निहोत्री (Aiims say Abhi Abhi) 

मेरे पिताजी