Wednesday, June 03, 2020

मुक्त परिन्दें

ये मन के भाव हठीले 
अनगिनत   भेद   खोले 
शब्दों के अर्थ विधान 
भावों को दे विस्तार अंनत 
भाव मेरे मुक्त पंरिदे 
दूर क्षितिज पर उड़ते हैं 
बेमौसम   बादल से 
रीते   ही  फिरते  हैं 
भावों का सम्मोहन आडम्बर 
भावों  की  यही आत्म प्रवचंना 
जाने क्या -क्या स्वाँग  धरे 
मैं  भावों  की मौन पुजारिन 
अभावों   के  फूल चढाँऊ 
देह मेरी भावों का रैन बसेरा 
निश्चेतन   निर्वाण   धरे
निश्चेतन    निर्वाण  धरे।। 
Dr priyadarshini agnihotri

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