ये मन के भाव हठीले
अनगिनत भेद खोले
शब्दों के अर्थ विधान
भावों को दे विस्तार अंनत
भाव मेरे मुक्त पंरिदे
दूर क्षितिज पर उड़ते हैं
बेमौसम बादल से
रीते ही फिरते हैं
भावों का सम्मोहन आडम्बर
भावों की यही आत्म प्रवचंना
जाने क्या -क्या स्वाँग धरे
मैं भावों की मौन पुजारिन
अभावों के फूल चढाँऊ
देह मेरी भावों का रैन बसेरा
निश्चेतन निर्वाण धरे
निश्चेतन निर्वाण धरे।।
Dr priyadarshini agnihotri
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