Tuesday, June 02, 2020

सहज सरलकितना सहज सरल होता है किसी और के मन को समझाना कितना करूण कठिन होता है बीती बातें मन की भुलाना सूनेपन में मैं पलती हूँ दिशा दिशा से मौन उमड़ कर तृण तृण पर छाया करता है फिर भी मन की कुटिया में अनुराग दीप जलाती हूँ मेरे मन के दीप जले जल जल कर पागल अलसाये इन दीपो की छाया में शायद कोई तो अब मुस्काए।।डॉ प्रियदर्शिनी अग्निहोत्री

सहज सरल

कितना सहज सरल होता है 
किसी और के मन को समझाना 
कितना करूण कठिन होता है 
बीती बातें मन की भुलाना 
सूनेपन में मैं पलती हूँ 
दिशा दिशा से मौन उमड़ कर 
तृण तृण पर छाया करता है 
फिर भी मन की कुटिया में 
अनुराग दीप जलाती हूँ 
मेरे मन के दीप जले 
जल जल कर पागल अलसाये 
इन दीपो की छाया में 
शायद कोई तो अब मुस्काए।।

डॉ प्रियदर्शिनी अग्निहोत्री

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